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एक किशोर की छोटी-सी हरकत और सांप्रदायिक दंगा लगभग होते-होते रह गया। पिछले हफ्ते मेरठ में हुई यह घटना हमारे समाज की सोच और सोशल मीडिया की नई दुनिया के बारे में बहुत कुछ कहती है।


उस किशोर ने फेसबुक पर एक ऐसी तस्वीर अपलोड कर दी थी, जो आपत्तिजनक थी, इस तस्वीर के अपलोड होते ही कुछ घंटे के भीतर एक समुदाय के सैकड़ों गुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए। जब तक प्रशासन समझ पाता कि माजरा क्या है, मेरठ में दंगे के हालात बन गए। प्रशासन ने हालात को बिगड़ने नहीं दिया और जल्द ही वह फोटो अपलोड करने वाले तक भी पहुंच गया।
किसी की आपत्तिजनक तस्वीर या पोस्टर बना देना, भड़काऊ बयान दे देना और इन सब पर लोगों के गुस्से का भड़क जाना, इसमें कुछ भी नया नहीं है। ये सारी चीजें तब भी होती थीं, जब मोबाइल फोन, एसएमएस और सोशल मीडिया नहीं थे। इसलिए आधुनिक उपकरणों और सोशल मीडिया को दोषी ठहराने का कोई अर्थ नहीं है।
लेकिन दिक्कत दूसरी जगह है। इन उपकरणों का इस्तेमाल हम अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने और संवाद व संचार की गति बढ़ाने के लिए करते हैं। इनके जरिये हम अपनी चीजों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कम समय में पहुंचा देते हैं। इसलिए जब कोई आपत्तिजनक चीज सोशल मीडिया पर आती है, तो वह भी बहुत जल्द दुनिया के हर कोने में पहुंच जाती है, इस पर प्रतिक्रिया भी काफी तेज होती है।
मिस्र के तहरीर चौक और टय़ूनीशिया के जैस्मीन रिवॉल्यूशन में हमने सोशल मीडिया का एक सकारात्मक पक्ष देखा था, तो दंगे भड़काने की आशंका इसका एक खतरनाक पक्ष भी है।
यह सिर्फ आशंका ही नहीं है। सोशल मीडिया क्या कर सकता है, लंदन के दंगे इसका एक अच्छा उदाहरण हैं। पिछले साल लंदन में हुए इन दंगों की आग भड़काने में तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ ही था, बाद में दंगाइयों ने इसी मीडिया के जरिये इस तरह के संदेश भी भेजे कि कहां से क्या सामान लूटा जा सकता है।
कुछ ऐसी ही स्थिति वैंकुअर के दंगों में भी थी। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि दंगों की स्थिति में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की नीति बनाने पर विचार होने लगा था। लेकिन ऐसा भी नहीं था कि दंगों के दौरान सोशल मीडिया का बस गलत इस्तेमाल ही हुआ। इसी दौरान ऐसे लोग भी थे, जो अपने परिजनों की खैरियत पता लगाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे थे।
सोशल मीडिया युग के आपत्तिजनक व्यवहार पुराने दौर के आपत्तिजनक व्यवहार से कई मायनों में अलग हैं। एक तो इसमें गड़बड़ी काफी तेजी से फैलाई जा सकती है, और दूसरे इस गड़बड़ी को फैलाने वाले मान लेते हैं कि इस काम को वे लगभग गुमनाम रहते हुए भी अंजाम दे सकते हैं। हालांकि सच यह नहीं है, अगर कोशिश की जाए, तो सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक व्यवहार करने वालों को पकड़ा जा सकता है।
जैसा कि मेरठ के उस किशोर तक पुलिस आसानी से पहुंच गई। या लंदन दंगों में शामिल कई लोगों को वहां की पुलिस ने पकड़ा और उनके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज किए। इसके विपरीत पहले के दौर में अफवाह फैलाने या पोस्टर चिपकाकर गायब हो जाने वालों तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता था।
यह समस्या दरअसल कुछ हद तक हमारे ऑनलाइन व्यवहार से जुड़ी है। और बहुत हद तक इसका इलाज कोई नया नहीं, पुराना है। मसलन, मेरठ के उस किशोर को ही लें। जाने-अनजाने वह फेसबुक पर आपत्तिजनक तस्वीर डाल देता है। वह भी उस उम्र में, जब उसे ठीक से नहीं पता कि जो वह कर रहा है, उसका असर क्या होगा।
क्या यह उन किशोरों की तरह नहीं लगता, जो ड्राइविंग लाइसेंस उम्र तक पहुंचने से पहले ही स्कूटर या कार लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं और कई बार भीषण दुर्घटनाएं कर बैठते हैं? ऐसे मौकों पर हम उन किशोरों को नहीं, उनके मां-बाप को दोषी ठहराते हैं।
ड्राइविंग का थ्रिल बच्चों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन उन्हें रोकना उनके अभिभावकों की ही जिम्मेदारी मानी जाती है। इस लिहाज से बच्चों के ऑनलाइन आपत्तिजनक व्यवहार की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। बच्चों और खासकर किशोरों को इंटरनेट से दूर रखा जाए, यह कोई नहीं कहता, लेकिन धारणा यह है कि यह काम पैरेंटल गाइडेंस यानी अभिभावकों की निगरानी में ही होना चाहिए।
लेकिन कितने घरों में ऐसा होता है? शुरू में नेट-नैनी जैसे कई सॉफ्टवेयर बनाए गए थे, जिनका इस्तेमाल करके बच्चों को आपत्तिजनक वेबसाइटों पर जाने से रोका जा सकता था, लेकिन भारत में इस तरह के सॉफ्टवेयर ज्यादा इस्तेमाल नहीं हुए। स्कूलों में भी कंप्यूटर और इंटरनेट के बहुत से पाठ पढ़ाए जाते हैं, पर ऑनलाइन व्यवहार के बारे में शायद ही कहीं पढ़ाया-सिखाया जाता हो।
दूसरा सवाल उस समाज के बारे में भी है, जो आपत्तिजनक सामग्री देखते ही भड़क उठता है और सड़कों पर उतर आता है। निश्चित तौर पर इस भड़कने और सड़क पर उतर आने के पीछे एक राजनीति भी होती है। जिस देश में सांप्रदायिक दंगों का इस्तेमाल वोट बैंक बनाने में किया जाता हो, वहां उन्माद फैलाना राजनीति का एक सहायक पेशा हो सकता है।
लेकिन उन्माद और दंगों की राजनीति करने वाले अक्सर इसीलिए सफल हो पाते हैं कि समाज में सहिष्णुता नहीं है। लोगों को पता नहीं है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो वे क्या करें? किसे रिपोर्ट करें? और आपत्तिजनक सामग्री को कैसे हटवाया जाए? ऐसे में, वे अक्सर प्रशासन के पास जाने की बजाय समुदाय के नेताओं के पास जाते हैं। ये कोशिशें भी अक्सर उन्हें उन्माद की ओर ही ले जाती हैं।
लेकिन अगर वे प्रशासन के पास जाएं, तो क्या हो? हमारा साइबर कानून कहता है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो प्रशासन वेबसाइट से संपर्क करे। वेबसाइट चलाने वालों की यह जिम्मेदारी है कि वह उस सामग्री को 36 घंटे के भीतर वहां से हटवाएं। मगर सोशल मीडिया और उन्माद भड़क जाने, दोनों के ही लिहाज से देखें, तो 36 घंटे बहुत बड़ा समय है।
अगर हम सचमुच किसी अनहोनी को रोकना चाहते हैं, तो इस काम को तत्काल करने की व्यवस्था बनानी ही होगी। इंटरनेट और  एक किशोर की छोटी-सी हरकत और सांप्रदायिक दंगा लगभग होते-होते रह गया। पिछले हफ्ते मेरठ में हुई यह घटना हमारे समाज की सोच और सोशल मीडिया की नई दुनिया के बारे में बहुत कुछ कहती है।
उस किशोर ने फेसबुक पर एक ऐसी तस्वीर अपलोड कर दी थी, जो आपत्तिजनक थी, इस तस्वीर के अपलोड होते ही कुछ घंटे के भीतर एक समुदाय के सैकड़ों गुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए। जब तक प्रशासन समझ पाता कि माजरा क्या है, मेरठ में दंगे के हालात बन गए। प्रशासन ने हालात को बिगड़ने नहीं दिया और जल्द ही वह फोटो अपलोड करने वाले तक भी पहुंच गया।
किसी की आपत्तिजनक तस्वीर या पोस्टर बना देना, भड़काऊ बयान दे देना और इन सब पर लोगों के गुस्से का भड़क जाना, इसमें कुछ भी नया नहीं है। ये सारी चीजें तब भी होती थीं, जब मोबाइल फोन, एसएमएस और सोशल मीडिया नहीं थे। इसलिए आधुनिक उपकरणों और सोशल मीडिया को दोषी ठहराने का कोई अर्थ नहीं है।
लेकिन दिक्कत दूसरी जगह है। इन उपकरणों का इस्तेमाल हम अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने और संवाद व संचार की गति बढ़ाने के लिए करते हैं। इनके जरिये हम अपनी चीजों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कम समय में पहुंचा देते हैं। इसलिए जब कोई आपत्तिजनक चीज सोशल मीडिया पर आती है, तो वह भी बहुत जल्द दुनिया के हर कोने में पहुंच जाती है, इस पर प्रतिक्रिया भी काफी तेज होती है।
मिस्र के तहरीर चौक और टय़ूनीशिया के जैस्मीन रिवॉल्यूशन में हमने सोशल मीडिया का एक सकारात्मक पक्ष देखा था, तो दंगे भड़काने की आशंका इसका एक खतरनाक पक्ष भी है।
यह सिर्फ आशंका ही नहीं है। सोशल मीडिया क्या कर सकता है, लंदन के दंगे इसका एक अच्छा उदाहरण हैं। पिछले साल लंदन में हुए इन दंगों की आग भड़काने में तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ ही था, बाद में दंगाइयों ने इसी मीडिया के जरिये इस तरह के संदेश भी भेजे कि कहां से क्या सामान लूटा जा सकता है।
कुछ ऐसी ही स्थिति वैंकुअर के दंगों में भी थी। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि दंगों की स्थिति में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की नीति बनाने पर विचार होने लगा था। लेकिन ऐसा भी नहीं था कि दंगों के दौरान सोशल मीडिया का बस गलत इस्तेमाल ही हुआ। इसी दौरान ऐसे लोग भी थे, जो अपने परिजनों की खैरियत पता लगाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे थे।
सोशल मीडिया युग के आपत्तिजनक व्यवहार पुराने दौर के आपत्तिजनक व्यवहार से कई मायनों में अलग हैं। एक तो इसमें गड़बड़ी काफी तेजी से फैलाई जा सकती है, और दूसरे इस गड़बड़ी को फैलाने वाले मान लेते हैं कि इस काम को वे लगभग गुमनाम रहते हुए भी अंजाम दे सकते हैं। हालांकि सच यह नहीं है, अगर कोशिश की जाए, तो सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक व्यवहार करने वालों को पकड़ा जा सकता है।
जैसा कि मेरठ के उस किशोर तक पुलिस आसानी से पहुंच गई। या लंदन दंगों में शामिल कई लोगों को वहां की पुलिस ने पकड़ा और उनके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज किए। इसके विपरीत पहले के दौर में अफवाह फैलाने या पोस्टर चिपकाकर गायब हो जाने वालों तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता था।
यह समस्या दरअसल कुछ हद तक हमारे ऑनलाइन व्यवहार से जुड़ी है। और बहुत हद तक इसका इलाज कोई नया नहीं, पुराना है। मसलन, मेरठ के उस किशोर को ही लें। जाने-अनजाने वह फेसबुक पर आपत्तिजनक तस्वीर डाल देता है। वह भी उस उम्र में, जब उसे ठीक से नहीं पता कि जो वह कर रहा है, उसका असर क्या होगा।
क्या यह उन किशोरों की तरह नहीं लगता, जो ड्राइविंग लाइसेंस उम्र तक पहुंचने से पहले ही स्कूटर या कार लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं और कई बार भीषण दुर्घटनाएं कर बैठते हैं? ऐसे मौकों पर हम उन किशोरों को नहीं, उनके मां-बाप को दोषी ठहराते हैं।
ड्राइविंग का थ्रिल बच्चों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन उन्हें रोकना उनके अभिभावकों की ही जिम्मेदारी मानी जाती है। इस लिहाज से बच्चों के ऑनलाइन आपत्तिजनक व्यवहार की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। बच्चों और खासकर किशोरों को इंटरनेट से दूर रखा जाए, यह कोई नहीं कहता, लेकिन धारणा यह है कि यह काम पैरेंटल गाइडेंस यानी अभिभावकों की निगरानी में ही होना चाहिए।
लेकिन कितने घरों में ऐसा होता है? शुरू में नेट-नैनी जैसे कई सॉफ्टवेयर बनाए गए थे, जिनका इस्तेमाल करके बच्चों को आपत्तिजनक वेबसाइटों पर जाने से रोका जा सकता था, लेकिन भारत में इस तरह के सॉफ्टवेयर ज्यादा इस्तेमाल नहीं हुए। स्कूलों में भी  कंप्यूटर और इंटरनेट के बहुत से पाठ पढ़ाए जाते हैं, पर ऑनलाइन व्यवहार के बारे में शायद ही कहीं पढ़ाया-सिखाया जाता हो।
दूसरा सवाल उस समाज के बारे में भी है, जो आपत्तिजनक सामग्री देखते ही भड़क उठता है और सड़कों पर उतर आता है। निश्चित तौर पर इस भड़कने और सड़क पर उतर आने के पीछे एक राजनीति भी होती है। जिस देश में सांप्रदायिक दंगों का इस्तेमाल वोट बैंक बनाने में किया जाता हो, वहां उन्माद फैलाना राजनीति का एक सहायक पेशा हो सकता है।
लेकिन उन्माद और दंगों की राजनीति करने वाले अक्सर इसीलिए सफल हो पाते हैं कि समाज में सहिष्णुता नहीं है। लोगों को पता नहीं है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो वे क्या करें? किसे रिपोर्ट करें? और आपत्तिजनक सामग्री को कैसे हटवाया जाए? ऐसे में, वे अक्सर प्रशासन के पास जाने की बजाय समुदाय के नेताओं के पास जाते हैं। ये कोशिशें भी अक्सर उन्हें उन्माद की ओर ही ले जाती हैं।
लेकिन अगर वे प्रशासन के पास जाएं, तो क्या हो? हमारा साइबर कानून कहता है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो प्रशासन वेबसाइट से संपर्क करे। वेबसाइट चलाने वालों की यह जिम्मेदारी है कि वह उस सामग्री को 36 घंटे के भीतर वहां से हटवाएं। मगर सोशल मीडिया और उन्माद भड़क जाने, दोनों के ही लिहाज से देखें, तो 36 घंटे बहुत बड़ा समय है।
अगर हम सचमुच किसी अनहोनी को रोकना चाहते हैं, तो इस काम को तत्काल करने की व्यवस्था बनानी ही होगी। इंटरनेट और सोशल मीडिया जब हर चीज को बदल रहा है, तो हमें अपने तौर-तरीके भी बदलने ही होंगे।  जब हर चीज को बदल रहा है, तो हमें अपने तौर-तरीके भी बदलने ही होंगे।


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Tuesday | 2 comments | Labels:

2 comments:

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  1. Anonymous
    00:53

    nice

  1. अनिल गुप्ता
    00:54

    Thanks

Confused? आप की राय का स्वागत है.