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नकली नोटों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने एक ऐसी वेबसाइट लांच की है जो लोगों को यह बताएगी कि वे नकली नोटों को कैसे पहचानेंगे। ‘पहचानों पैसे की बोली, क्यूंकि पैसा बोलता है’ टैग लाइन वाली इस वेबसाइट पर 10, 20, 50, 100, 500 और 1000 रुपये के नोटों की पहचान करने के तरीकों को चित्र के साथ दर्शाया गया है।

इस वेबसाइट को आप www.paisaboltahai.rbi.org.in पर लॉग कर खोल सकते हैं। वेबसाइट पर जाने के बाद नोटों के फोटो पर क्लिक करने पर स्क्त्रस्न पर बड़ा सा नोट उभर कर आएगा और उस पर नंबर के साथ नकली नोटों की पहचान बताई गई है। नकली नोटों की पहचान बताने वाले इन नोटों के पोस्टर को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं। वेबसाइट से आप नकली नोटों की पहचान बताने वाली डॉक्यूमेंटरी फिल्म भी डाउनलोड कर सकते हैं। इस वेबसाइट का लिंक आरबीआई के मुख्य वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। वेबसाइट पर पकड़े गए नकली नोटों के बारे में भी विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई है।

आरबीआई के अनुसार 31 मार्च, 2011 तक 64,577 मिलियन बैंक नोट बाजार में हैं। पकड़े गए नकली नोटों के आधार पर बैंक ने कहा है कि वर्ष 2010-11 में एक मिलियन बैंक नोटों में 6.74 नोट नकली पाए गए थे। आरबीआई नकली नोटों के प्रति लोगों को हमेशा से सजग करता रहा है। शुक्रवार को कोझीकोड में आरबीआई के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने नकली नोटों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए कहा था कि इस पर अंकुश लगाने के लिए सरकार और पुलिस की ओर से कई ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

Monday | 2 comments | Labels:
एक किशोर की छोटी-सी हरकत और सांप्रदायिक दंगा लगभग होते-होते रह गया। पिछले हफ्ते मेरठ में हुई यह घटना हमारे समाज की सोच और सोशल मीडिया की नई दुनिया के बारे में बहुत कुछ कहती है।


उस किशोर ने फेसबुक पर एक ऐसी तस्वीर अपलोड कर दी थी, जो आपत्तिजनक थी, इस तस्वीर के अपलोड होते ही कुछ घंटे के भीतर एक समुदाय के सैकड़ों गुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए। जब तक प्रशासन समझ पाता कि माजरा क्या है, मेरठ में दंगे के हालात बन गए। प्रशासन ने हालात को बिगड़ने नहीं दिया और जल्द ही वह फोटो अपलोड करने वाले तक भी पहुंच गया।
किसी की आपत्तिजनक तस्वीर या पोस्टर बना देना, भड़काऊ बयान दे देना और इन सब पर लोगों के गुस्से का भड़क जाना, इसमें कुछ भी नया नहीं है। ये सारी चीजें तब भी होती थीं, जब मोबाइल फोन, एसएमएस और सोशल मीडिया नहीं थे। इसलिए आधुनिक उपकरणों और सोशल मीडिया को दोषी ठहराने का कोई अर्थ नहीं है।
लेकिन दिक्कत दूसरी जगह है। इन उपकरणों का इस्तेमाल हम अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने और संवाद व संचार की गति बढ़ाने के लिए करते हैं। इनके जरिये हम अपनी चीजों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कम समय में पहुंचा देते हैं। इसलिए जब कोई आपत्तिजनक चीज सोशल मीडिया पर आती है, तो वह भी बहुत जल्द दुनिया के हर कोने में पहुंच जाती है, इस पर प्रतिक्रिया भी काफी तेज होती है।
मिस्र के तहरीर चौक और टय़ूनीशिया के जैस्मीन रिवॉल्यूशन में हमने सोशल मीडिया का एक सकारात्मक पक्ष देखा था, तो दंगे भड़काने की आशंका इसका एक खतरनाक पक्ष भी है।
यह सिर्फ आशंका ही नहीं है। सोशल मीडिया क्या कर सकता है, लंदन के दंगे इसका एक अच्छा उदाहरण हैं। पिछले साल लंदन में हुए इन दंगों की आग भड़काने में तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ ही था, बाद में दंगाइयों ने इसी मीडिया के जरिये इस तरह के संदेश भी भेजे कि कहां से क्या सामान लूटा जा सकता है।
कुछ ऐसी ही स्थिति वैंकुअर के दंगों में भी थी। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि दंगों की स्थिति में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की नीति बनाने पर विचार होने लगा था। लेकिन ऐसा भी नहीं था कि दंगों के दौरान सोशल मीडिया का बस गलत इस्तेमाल ही हुआ। इसी दौरान ऐसे लोग भी थे, जो अपने परिजनों की खैरियत पता लगाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे थे।
सोशल मीडिया युग के आपत्तिजनक व्यवहार पुराने दौर के आपत्तिजनक व्यवहार से कई मायनों में अलग हैं। एक तो इसमें गड़बड़ी काफी तेजी से फैलाई जा सकती है, और दूसरे इस गड़बड़ी को फैलाने वाले मान लेते हैं कि इस काम को वे लगभग गुमनाम रहते हुए भी अंजाम दे सकते हैं। हालांकि सच यह नहीं है, अगर कोशिश की जाए, तो सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक व्यवहार करने वालों को पकड़ा जा सकता है।
जैसा कि मेरठ के उस किशोर तक पुलिस आसानी से पहुंच गई। या लंदन दंगों में शामिल कई लोगों को वहां की पुलिस ने पकड़ा और उनके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज किए। इसके विपरीत पहले के दौर में अफवाह फैलाने या पोस्टर चिपकाकर गायब हो जाने वालों तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता था।
यह समस्या दरअसल कुछ हद तक हमारे ऑनलाइन व्यवहार से जुड़ी है। और बहुत हद तक इसका इलाज कोई नया नहीं, पुराना है। मसलन, मेरठ के उस किशोर को ही लें। जाने-अनजाने वह फेसबुक पर आपत्तिजनक तस्वीर डाल देता है। वह भी उस उम्र में, जब उसे ठीक से नहीं पता कि जो वह कर रहा है, उसका असर क्या होगा।
क्या यह उन किशोरों की तरह नहीं लगता, जो ड्राइविंग लाइसेंस उम्र तक पहुंचने से पहले ही स्कूटर या कार लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं और कई बार भीषण दुर्घटनाएं कर बैठते हैं? ऐसे मौकों पर हम उन किशोरों को नहीं, उनके मां-बाप को दोषी ठहराते हैं।
ड्राइविंग का थ्रिल बच्चों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन उन्हें रोकना उनके अभिभावकों की ही जिम्मेदारी मानी जाती है। इस लिहाज से बच्चों के ऑनलाइन आपत्तिजनक व्यवहार की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। बच्चों और खासकर किशोरों को इंटरनेट से दूर रखा जाए, यह कोई नहीं कहता, लेकिन धारणा यह है कि यह काम पैरेंटल गाइडेंस यानी अभिभावकों की निगरानी में ही होना चाहिए।
लेकिन कितने घरों में ऐसा होता है? शुरू में नेट-नैनी जैसे कई सॉफ्टवेयर बनाए गए थे, जिनका इस्तेमाल करके बच्चों को आपत्तिजनक वेबसाइटों पर जाने से रोका जा सकता था, लेकिन भारत में इस तरह के सॉफ्टवेयर ज्यादा इस्तेमाल नहीं हुए। स्कूलों में भी कंप्यूटर और इंटरनेट के बहुत से पाठ पढ़ाए जाते हैं, पर ऑनलाइन व्यवहार के बारे में शायद ही कहीं पढ़ाया-सिखाया जाता हो।
दूसरा सवाल उस समाज के बारे में भी है, जो आपत्तिजनक सामग्री देखते ही भड़क उठता है और सड़कों पर उतर आता है। निश्चित तौर पर इस भड़कने और सड़क पर उतर आने के पीछे एक राजनीति भी होती है। जिस देश में सांप्रदायिक दंगों का इस्तेमाल वोट बैंक बनाने में किया जाता हो, वहां उन्माद फैलाना राजनीति का एक सहायक पेशा हो सकता है।
लेकिन उन्माद और दंगों की राजनीति करने वाले अक्सर इसीलिए सफल हो पाते हैं कि समाज में सहिष्णुता नहीं है। लोगों को पता नहीं है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो वे क्या करें? किसे रिपोर्ट करें? और आपत्तिजनक सामग्री को कैसे हटवाया जाए? ऐसे में, वे अक्सर प्रशासन के पास जाने की बजाय समुदाय के नेताओं के पास जाते हैं। ये कोशिशें भी अक्सर उन्हें उन्माद की ओर ही ले जाती हैं।
लेकिन अगर वे प्रशासन के पास जाएं, तो क्या हो? हमारा साइबर कानून कहता है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो प्रशासन वेबसाइट से संपर्क करे। वेबसाइट चलाने वालों की यह जिम्मेदारी है कि वह उस सामग्री को 36 घंटे के भीतर वहां से हटवाएं। मगर सोशल मीडिया और उन्माद भड़क जाने, दोनों के ही लिहाज से देखें, तो 36 घंटे बहुत बड़ा समय है।
अगर हम सचमुच किसी अनहोनी को रोकना चाहते हैं, तो इस काम को तत्काल करने की व्यवस्था बनानी ही होगी। इंटरनेट और  एक किशोर की छोटी-सी हरकत और सांप्रदायिक दंगा लगभग होते-होते रह गया। पिछले हफ्ते मेरठ में हुई यह घटना हमारे समाज की सोच और सोशल मीडिया की नई दुनिया के बारे में बहुत कुछ कहती है।
उस किशोर ने फेसबुक पर एक ऐसी तस्वीर अपलोड कर दी थी, जो आपत्तिजनक थी, इस तस्वीर के अपलोड होते ही कुछ घंटे के भीतर एक समुदाय के सैकड़ों गुस्साए लोग सड़कों पर उतर आए। जब तक प्रशासन समझ पाता कि माजरा क्या है, मेरठ में दंगे के हालात बन गए। प्रशासन ने हालात को बिगड़ने नहीं दिया और जल्द ही वह फोटो अपलोड करने वाले तक भी पहुंच गया।
किसी की आपत्तिजनक तस्वीर या पोस्टर बना देना, भड़काऊ बयान दे देना और इन सब पर लोगों के गुस्से का भड़क जाना, इसमें कुछ भी नया नहीं है। ये सारी चीजें तब भी होती थीं, जब मोबाइल फोन, एसएमएस और सोशल मीडिया नहीं थे। इसलिए आधुनिक उपकरणों और सोशल मीडिया को दोषी ठहराने का कोई अर्थ नहीं है।
लेकिन दिक्कत दूसरी जगह है। इन उपकरणों का इस्तेमाल हम अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने और संवाद व संचार की गति बढ़ाने के लिए करते हैं। इनके जरिये हम अपनी चीजों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कम समय में पहुंचा देते हैं। इसलिए जब कोई आपत्तिजनक चीज सोशल मीडिया पर आती है, तो वह भी बहुत जल्द दुनिया के हर कोने में पहुंच जाती है, इस पर प्रतिक्रिया भी काफी तेज होती है।
मिस्र के तहरीर चौक और टय़ूनीशिया के जैस्मीन रिवॉल्यूशन में हमने सोशल मीडिया का एक सकारात्मक पक्ष देखा था, तो दंगे भड़काने की आशंका इसका एक खतरनाक पक्ष भी है।
यह सिर्फ आशंका ही नहीं है। सोशल मीडिया क्या कर सकता है, लंदन के दंगे इसका एक अच्छा उदाहरण हैं। पिछले साल लंदन में हुए इन दंगों की आग भड़काने में तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ ही था, बाद में दंगाइयों ने इसी मीडिया के जरिये इस तरह के संदेश भी भेजे कि कहां से क्या सामान लूटा जा सकता है।
कुछ ऐसी ही स्थिति वैंकुअर के दंगों में भी थी। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि दंगों की स्थिति में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की नीति बनाने पर विचार होने लगा था। लेकिन ऐसा भी नहीं था कि दंगों के दौरान सोशल मीडिया का बस गलत इस्तेमाल ही हुआ। इसी दौरान ऐसे लोग भी थे, जो अपने परिजनों की खैरियत पता लगाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे थे।
सोशल मीडिया युग के आपत्तिजनक व्यवहार पुराने दौर के आपत्तिजनक व्यवहार से कई मायनों में अलग हैं। एक तो इसमें गड़बड़ी काफी तेजी से फैलाई जा सकती है, और दूसरे इस गड़बड़ी को फैलाने वाले मान लेते हैं कि इस काम को वे लगभग गुमनाम रहते हुए भी अंजाम दे सकते हैं। हालांकि सच यह नहीं है, अगर कोशिश की जाए, तो सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक व्यवहार करने वालों को पकड़ा जा सकता है।
जैसा कि मेरठ के उस किशोर तक पुलिस आसानी से पहुंच गई। या लंदन दंगों में शामिल कई लोगों को वहां की पुलिस ने पकड़ा और उनके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज किए। इसके विपरीत पहले के दौर में अफवाह फैलाने या पोस्टर चिपकाकर गायब हो जाने वालों तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता था।
यह समस्या दरअसल कुछ हद तक हमारे ऑनलाइन व्यवहार से जुड़ी है। और बहुत हद तक इसका इलाज कोई नया नहीं, पुराना है। मसलन, मेरठ के उस किशोर को ही लें। जाने-अनजाने वह फेसबुक पर आपत्तिजनक तस्वीर डाल देता है। वह भी उस उम्र में, जब उसे ठीक से नहीं पता कि जो वह कर रहा है, उसका असर क्या होगा।
क्या यह उन किशोरों की तरह नहीं लगता, जो ड्राइविंग लाइसेंस उम्र तक पहुंचने से पहले ही स्कूटर या कार लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं और कई बार भीषण दुर्घटनाएं कर बैठते हैं? ऐसे मौकों पर हम उन किशोरों को नहीं, उनके मां-बाप को दोषी ठहराते हैं।
ड्राइविंग का थ्रिल बच्चों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन उन्हें रोकना उनके अभिभावकों की ही जिम्मेदारी मानी जाती है। इस लिहाज से बच्चों के ऑनलाइन आपत्तिजनक व्यवहार की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। बच्चों और खासकर किशोरों को इंटरनेट से दूर रखा जाए, यह कोई नहीं कहता, लेकिन धारणा यह है कि यह काम पैरेंटल गाइडेंस यानी अभिभावकों की निगरानी में ही होना चाहिए।
लेकिन कितने घरों में ऐसा होता है? शुरू में नेट-नैनी जैसे कई सॉफ्टवेयर बनाए गए थे, जिनका इस्तेमाल करके बच्चों को आपत्तिजनक वेबसाइटों पर जाने से रोका जा सकता था, लेकिन भारत में इस तरह के सॉफ्टवेयर ज्यादा इस्तेमाल नहीं हुए। स्कूलों में भी  कंप्यूटर और इंटरनेट के बहुत से पाठ पढ़ाए जाते हैं, पर ऑनलाइन व्यवहार के बारे में शायद ही कहीं पढ़ाया-सिखाया जाता हो।
दूसरा सवाल उस समाज के बारे में भी है, जो आपत्तिजनक सामग्री देखते ही भड़क उठता है और सड़कों पर उतर आता है। निश्चित तौर पर इस भड़कने और सड़क पर उतर आने के पीछे एक राजनीति भी होती है। जिस देश में सांप्रदायिक दंगों का इस्तेमाल वोट बैंक बनाने में किया जाता हो, वहां उन्माद फैलाना राजनीति का एक सहायक पेशा हो सकता है।
लेकिन उन्माद और दंगों की राजनीति करने वाले अक्सर इसीलिए सफल हो पाते हैं कि समाज में सहिष्णुता नहीं है। लोगों को पता नहीं है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो वे क्या करें? किसे रिपोर्ट करें? और आपत्तिजनक सामग्री को कैसे हटवाया जाए? ऐसे में, वे अक्सर प्रशासन के पास जाने की बजाय समुदाय के नेताओं के पास जाते हैं। ये कोशिशें भी अक्सर उन्हें उन्माद की ओर ही ले जाती हैं।
लेकिन अगर वे प्रशासन के पास जाएं, तो क्या हो? हमारा साइबर कानून कहता है कि अगर कुछ आपत्तिजनक दिखे, तो प्रशासन वेबसाइट से संपर्क करे। वेबसाइट चलाने वालों की यह जिम्मेदारी है कि वह उस सामग्री को 36 घंटे के भीतर वहां से हटवाएं। मगर सोशल मीडिया और उन्माद भड़क जाने, दोनों के ही लिहाज से देखें, तो 36 घंटे बहुत बड़ा समय है।
अगर हम सचमुच किसी अनहोनी को रोकना चाहते हैं, तो इस काम को तत्काल करने की व्यवस्था बनानी ही होगी। इंटरनेट और सोशल मीडिया जब हर चीज को बदल रहा है, तो हमें अपने तौर-तरीके भी बदलने ही होंगे।  जब हर चीज को बदल रहा है, तो हमें अपने तौर-तरीके भी बदलने ही होंगे।

Tuesday | 1 comments | Labels:
मुख्यमंत्री मायावती और उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के चुनाव चिह्न् हाथी की मूर्तियों को ढंकने के निर्वाचन आयोग के फैसले के खिलाफ दायर जनहित याचिका को बुधवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दी। उधर, निर्वाचन आयोग के आदेश पर मायावती और हाथियों की मूर्तियों को ढकने का काम बुधवार शाम तक पूरा हो गया।
इलाहाबाद निवासी धीरज प्रताप सिंह ने उच्च न्यायलय में जनहित याचिका दायर कर निर्वाचन आयोग के फैसले पर रोक लगाने की गुहार लगाते हुए कहा था कि हाथी हिंदुओं के देवता भगवान गणेश के प्रतीक हैं। उनकी मूर्तियां ढकने से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो सकती हैं।
याचिकाकर्ता के वकील अनिल तिवारी ने संवाददाताओं से कहा कि अदालत ने याचिका में तकनीकी खामियां बताकर उसे खारिज कर दिया। हालांकि अदालत ने भविष्य में नए सिरे से याचिका दाखिल करने की अनुमित दी है।
उधर, लखनऊ के गोमती नगर स्थित सामाजिक परिवर्तन स्थल, अम्बेडकर पार्क और सामाजिक परिवर्तन प्रतीक स्थल में मायावती और हाथियों को मूर्तियों को ढंकने का काम पूरा कर लिया गया।
लखनऊ के जिलाधिकारी अनिल कुमार सागर ने संवाददाताओं से कहा कि आकार से हिसाब से कुछ हाथी की मूर्तियों को जहां पीली पॉलीथीन से तो कुछ को रेशमी कपड़े से ढंका गया। मुख्यमंत्री मायावती की मूर्तियों को चारों तरफ लकड़ी की प्लाई के फ्रेम से ढका गया।
निर्वाचन आयोग की तरफ से बुधवार शाम तक मूर्तियों को ढकने की मोहलत दी गई थी। लखनऊ और गौतमबुद्धनगर में ढकी जाने वाली मूर्तिओं की संख्या करीब तीन सौ के आस-पास थी।

Thursday | 1 comments | Labels:
चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वो अन्य पिछड़ा वर्ग के निर्धारित आरक्षण में से साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यकों को देने के फ़ैसले पर फ़िलहाल रोक लगा दे.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समेत कई विपक्षी पार्टियों ने चुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार के इस फ़ैसले पर आपत्ति जताई थी.

चुनाव आयोग ने एक बयान में कहा है कि जब तक पाँच राज्यों में चुनाव की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, सरकार इस फ़ैसले पर रोक लगाए.

अपने बयान में आयोग ने कहा, "आयोग के ध्यान में ये बात लाई गई है कि अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की घोषणा आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है और आयोग को इस पर रोक लगानी चाहिए."

निर्देश

आयोग ने कहा है कि इस मुद्दे पर विचार करते समय उसने इस बात को ध्यान में रखा है कि केंद्र सरकार ने ये फ़ैसला 22 दिसंबर को आदर्श आचार संहिता लागू होने के दो दिन पहले किया था.

चुनाव आयोग ने कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि 22 दिसंबर 2011 के सरकारी आदेश पत्र को पाँच राज्यों गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में प्रभावी न माना जाए, जब तक कि इन राज्यों में चुनावी प्रक्रिया नहीं पूरी हो जाती.

केंद्र सरकार के इस फ़ैसले पर कई राजनीतिक दलों ने आपत्ति जताई थी और कहा था कि चुनाव तारीख़ों की घोषणा से कुछ दिन पहले की गई ये घोषणा मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है.

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पर्थ. डाउन अंडर टूर पर टीम इंडिया इस समय भले ही डाउन चल रही हो, लेकिन साल 2008 में अनिल कुंबले की अगुवाई में इस टीम ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन से एक कंगारू को करियर तबाह कर दिया था। वो ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी आज भी उस पल को याद कर सहम जाता है।

ऑस्ट्रेलियाई के शॉन टेट के जहन में 2008 का पर्थ टेस्ट आज भी ताजा है। इस टेस्ट में सचिन तेंडुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और इरफान पठान ने मिलकर मेजबान गेंदबाजों की जमकर धुनाई की थी। 

उस मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय बल्लेबाजी पर दबाव बनाने के लिए चार तेज गेंदबाजों को उतारा था। लेकिन यह पैंतरा मेजबान टीम के लिए महंगा साबित हुआ था। 

इस साल एकबार फिर ऑस्ट्रेलियाई खेमा कुछ ऐसे प्लान बना रहा है। पर्थ टेस्ट से पहले शॉन टेट ने अपनी टीम को सलाह दी है कि वो 2008 की गलती ना दोहराएं।

टेट ने कहा, "वो मैच मुझ पर एक शारीरिक और इमोशनल अत्याचार जैसा था। उसके बाद से मेरी क्रिकट खेलने की इच्छा ही खत्म हो गई।"

टेट का वह अंतिम टेस्ट मुकाबला था। उसके बाद टेट ने टेस्ट से संन्यास की घोषणा कर दी।

चार दिन में जीत गई थी टीम इंडिया

2008 में 16 जनवरी से पर्थ में खेले गए तीसरे टेस्ट में भारत ने मैच 72 रन से जीता था। तब मैच चार दिन में ही खत्म हो गया था। उस टीम के छह सदस्य वीरेंद्र सहवाग, राहुल द्रविड़, सचिन तेंडुलकर, वीवीएस लक्ष्मण, महेंद्र सिंह धोनी और इशांत शर्मा मौजूदा टीम में शामिल हैं।

द्रविड़ शतक चूके 

भारत ने तब टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया और 98.2 ओवर में 330 रन बनाए। द्रविड़ ने 93, सचिन ने 71, सहवाग ने 29, लक्ष्मण ने 27 और पठान ने 28 रन का योगदान दिया था।

आरपी सिंह ने झटके चार विकेट

भारतीय गेंदबाजों के शानदार प्रदर्शन के सामने ऑस्ट्रेलियाई पारी 50 ओवर में ही 212 रन पर ढेर हो गई। आरपी सिंह ने 68 रन पर चार विकेट, इरफान पठान ने 63 रन पर दो विकेट, ईशांत ने 34 रन पर दो विकेट और कुंबले ने 42 रन पर दो विकेट झटके। भारत ने दूसरी पारी में लक्ष्मण के क्लासिक 79 रन की बदौलत 80.4 ओवर में 294 रन बनाए। सहवाग ने 43, इरफान ने 46, धोनी ने 38 और आरपी सिंह ने 30 रन का योगदान दिया।

इरफान पठान बने मैन ऑफ द मैच

ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए 413 रन का लक्ष्य मिला लेकिन उसकी टीम 86.5 ओवर में 349 रन बना सकी। माइकल क्लार्क ने 81, मिशेल जॉनसन ने नाबाद 50, पोंटिंग ने 45 और माइक हसी ने 46 रन बनाए। इरफान पठान ने तीन विकेट, आरपी सिंह ने दो विकेट, अनिल कुंबले ने दो विकेट, वीरेंद्र सहवाग ने दो विकेट और ईशांत शर्मा ने एक विकेट लिया। ईशांत ने दोनों पारियों में ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग का विकेट लिया।
Wednesday | 1 comments | Labels:

देश में बिकने वाला करीब 70 प्रतिशत दूध मिलावटी होता है। एक राष्ट्रीय सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है। वर्ष 2011 में हुए इस सर्वे में करीब 69 फीसदी सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल हो गए। दूध में पानी और मिल्क पाउडर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए घातक डिटरजेंट की मिलावट भी पाई गई।

पैक और खुला दोनों तरह का दूध मिलावटी
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की ओर से यह सर्वे कराया गया था। सर्वे में पाया गया कि गोवा और पुडुचेरी को छोड़कर देश के अन्य सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में पैक और खुला दोनों तरह का दूध मिलावटी है। सर्वे में दूध के 1791 नमूनों की जांच के बाद पाया गया कि 69 प्रतिशत नमूने सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं।

सैंपल में सोडियम क्लोराइड भी पाया गया
इसमें बिहार, छत्तीसगढ़, दमन दीव, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और मिजोरम से लिए गए सभी सैंपल गुणवत्ता जांच फेल रहे। बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के सैंपलों में तो डिटरजेंट भी पाया गया। 8 फीसदी से ज्यादा (103) सैंपलों में डिटरजेंट पाया गया। असम से लिए गए सैंपल में सोडियम क्लोराइड भी पाया गया। नगालैंड से लिए दो सैंपलों में न्यूट्रलाइजर पाए गए। सर्वे में पाया गया कि दूध में पानी मिलाना सबसे आम है। मिलावट की दृष्टि से गांव के लोग शहरी लोगों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं। शहरों में बिकने वाला 68.9 प्रतिशत दूध मिलावटी है जबकि गांव में 31 प्रतिशत दूध ही मिलावट वाला है।

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